A Willing Burden

The burden of our idealism Made further heavier By cynical allies. Chained already by restrictions galore, Abandoned by society for Our moral quirks. Tempted we are to give it up For convenient bonhomie. Bound in compulsory choice We throw away our principles. When you see another nutcase Braver than you, Not giving up theirs, With … Continue reading A Willing Burden

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An In-between

Preface: I have written quite a bit about love, but something was always pricking me about the nature of relationship between two people of the opposite sexes and well, I have put into words. I hope the readers shall like it 🙂 I find you charming, Based on the hand revealed; Pretty oh yes and … Continue reading An In-between

Rejected

Author's note: While readers may beg to differ, the most stinging pain is the pain of being shunned for being different. It is maddening to wait for the one who gels with you, and easier to lose oneself in the intervening tide of resentment. Following is a poem capturing some of those feelings. I hope … Continue reading Rejected

आलसी हैं हम

आलसी हैं हम, जो  किसी को जानने का प्रयास भी नहीं करते । पूर्वजों की पट्टी पढ़, एक तोते की भाँति जी रहे हैं । "वह लड़की बहुत मिलनसार है, चरित्रहीन होगी, दूर रह उससे ।" "अपने माँसाहारी दोस्तों से दूरी बना के रखो कहीं तुम्हारा धर्म भ्रष्ट न कर दें ।" "क्या उपनाम है … Continue reading आलसी हैं हम

वर्षा की अपेक्षा

गर्मी से तप रहा है शरीर पसीने से अशान्त हो रहा है मन। पङ्खे से भी मानो आ रही है गरम हवा स्नान मानो स्वयं को पसीने में पुनः भिगोने के समान। तभी अचानक गरम हवा के थपेड़े समाप्त हुए और गगन ने छाई रङ्ग में स्वयं को ढाल लिया। हताश मन ने कहा, "अपेक्षाएँ … Continue reading वर्षा की अपेक्षा

डर लगता है

​गलियों को भगवा रंग के ध्वजों से सजा देख मुझे डर लगता है। गाड़ियों व मोटरसाइकिलों पर हरे झण्डों को देख मुझे डर लगता है।  कुर्ता-पैजामा पहने युवाओं को देख मुझे डर लगता है। वर्ष भर होते माता-रानी के जगराते के आयोजनकर्ताओं को देख मुझे डर लगता है। मुहल्ले में नये-नये मन्दिरों व मस्जिदों को … Continue reading डर लगता है